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कृपया यूनिकोड हिन्दी के विषय में जानकारी कर लें ....... .अन्यथा कृतिदेव फॉण्ट में लिखा आपका यह लेख केवल उन्ही कम्प्यूटर्स में दिखेगा जिनमे यह फॉण्ट होगा|
ReplyDeleteजानकारी के लिए आप संपर्क कर सकते हैं|
SIR JI CONSIDER THE FONT PLEASE. OTHERWISE USERS LIKE ME CAN NOT ENJOY UR EFFORT AND CAN'T GET BENEFITED
ReplyDelete@sanjay kumar thakur!
ReplyDeleteread this post in unicoded hindi !
एक षिक्षा मित्र जो कि वाराणसी के एक गामीण स्कल मे पढाते हैं। ने एक दिन पूछा कि उसके बच्चोंको पूरा ‘‘ककहरा’’ याद है फिर भी वाक्य नहीं पढ़ पाते । तीन अक्षर से बड़े षब्दों को भी पढ़ने में उनको मुष्किल होती है । क्यांे ???
इस क्यों का जवाब तो षिक्षा के कर्ताधर्ता अधिक दे पाएंगें । फिर भी इतना तो हर कोई जानता है- जब बच्चे षब्दों को अर्थ की इकाई के रूप में नहीं देख पाते तो उनको पढ़ने में मुष्किल होती है । यह मुष्किल स्कूल नहीं बल्कि व्यवस्था द्वारा पैदा की गई है ।
वर्श 1999 में जब उत्तर-प्रदेष में बड़े पैमाने पर पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों में बदलाव किया गया था तो काफी सोच-समझ के बाद पहली कक्षा में वर्णमाला को पुस्तक के अन्त में स्थान दिया गया था। मंषा थी कि बच्चे पहले अर्थ पकड़ना सीखें, षब्दों को अर्थ के रूप में ग्रहण करना सीखें फिर वर्णमाला तो अपने आप सीख लेंगे ।
लेकिन परिवर्तन के नाम पर पुनः सीखने को वर्णमाला केन्द्रित बना दिया गया । इतना ही नहीं बच्चों को ककहरा रटाने जैसी नीरस और यन्त्रणापूर्ण पद्धति में धकेल दिया गया । तो इस प्रकार की मुष्किलें तो आयेंगीं ही ।
इस प्रदेष के लिए तब तो यह और भी त्रासदीपूर्ण है जब पूरा देष सीखने के रचनावादी सिद्धान्त ‘‘कंस्ट्रटिविज्म’’ पर आधारित षिक्षण और प्रषिक्षण को जोष-खरोष से लागू करने की बात सोच रहा है, कर भी रहा है । देष में सबके लिए षिक्षा का कानून भी इस तरह की पद्धतियों का विरोध करता है । ऐसी पद्धतियों का बदलने की पहल कर रहा है ।
यह सारा कुछ सोच-समझ कर किया जा रहा है या कि सैकड़ों साल से दोहराई जा रही बेवकूफियों का एक और नमूना है ?
इसके बारे में कौन किसको सचेत करे ? और कब ??
क्या आपको नहीं लगता कि अब बहुत हो चुका । सूरत ही नहीं, सीरत भी बदलनी होगी ।
read श in place of ष !
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